मानव की दानव
मानव बनकर जन्म लिया, फिर क्यों दानवता अपनाई है,
स्वार्थ की अंधी दौड़ में, मानवता क्यों ठुकराई है।
आँखों में करुणा सूख गई, मन में नफरत का वास हुआ,
रिश्तों का हर कोमल धागा, छल से आज उदास हुआ।
मानव वह जो दर्द पराया अपने दिल में महसूस करे,
दानव वह जो दूसरों के सपनों को चूर-चूर करे।
भूखे को रोटी, प्यासे को जल, मानवता की पहचान है,
दीन-दुखी के संग जो खड़ा, वही सच्चा इंसान है।
सोचो, अपने कर्मों से तुम क्या जग को संदेश दोगे,
मानव बनकर प्रेम बाँटोगे या दानव बन घाव दोगे?॥
डॉ रुपाली गर्ग
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