कलम
जब कलम बोल उठी, मन की पीर खोल उठी,
जो कहा न जा सका, वो हर पंक्ति में डोल उठी।
चुप थे होंठ, पर शब्दों की चाल चल पड़ी,
सच की मशाल फिर अंधेरों में जल पड़ी।
भावों की नदी ने बहाव नया लिया,
हर अक्षर ने जैसे न्याय को छू लिया।
संवेदन की मिट्टी में बीज बो गई,
संघर्ष की हर बात को वो संजो गई।
कभी बनी वो क्रांति की हुंकार सी,
कभी बह चली ममता की फुहार सी।
जहाँ जुबां बंद थी, वहाँ वो गा उठी,
जहाँ अन्याय था, वहाँ वो छा उठी।
कलम जब बोल उठी, तो बदलाव लिख डाला,
एक छोटी सी नोक ने इतिहास बदल डाला।
ये सिर्फ़ लेखनी नहीं, आत्मा की आवाज़ थी,
हर पीड़ा, हर प्रश्न की यही तो परवाज़ थी।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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