जीवन

जीवन की पगडंडी टेढ़ी, सीधी कभी न होती,
हर मोड़ पर एक सीख मिली, हर हार कुछ कह जाती।

बचपन की मासूम गलियाँ, जवानी के सपने बड़े,
प्रौढ़ उम्र की चुप नज़रों में, अनुभव गहरे खड़े।

कभी धूप-सी तपती चाहत, कभी छाँव-सा चैन,
कभी साथ चले सब अपने, कभी मन में छुपा रैन।

कुछ रिश्ते मीठे लगे बहुत, कुछ चुभे बिन काँटे,
कुछ अपने भी दूर हुए, कुछ पराये बनकर आ बैठे।

संघर्षों से सीखा जीना, हारों में पाया मान,
जो टूटा, वो जोड़ सका मैं, यही है असली ज्ञान।

अब न आँखें जल्दी रोतीं, न हँसी में ढलते पल,
अनुभव ने सिखला दिया है, कब चुप रहना, कब चल।

डॉ रुपाली गर्ग 
मुंबई महाराष्ट्र

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