धरा
सुनो संताप वसुंधरा का, पीड़ा उसकी पहचानो तुम,
ममता की इस पावन धरती का, करुण क्रंदन जानो तुम।
जिसने अन्न उगाया तुमको, जल से जीवन सींचा है,
अपने आँचल में सुलाकर, हर दुख तुमसे खींचा है।
आज वही माँ व्यथित खड़ी है, घाव हृदय में गहरे हैं,
काट दिए वन, सूखीं नदियाँ, सपने उसके बिखरे हैं।
पर्वत रोते, झरने सूने, पंछी घर को तरस रहे,
स्वार्थ की अंधी दौड़ में मानव, अपने मूल से बिछड़ रहे।
धुएँ से घुटता नील गगन है, विष से व्याकुल जलधारा,
प्रकृति माँ की करुण पुकारें, सुन न पाया जग सारा।
कहती है— "हे मानव! सुन ले, मैं जीवन की जननी हूँ,
तेरे हर सुख-दुख की साथी, तेरे अस्तित्व की धनी हूँ।"
यदि मुझको तुम बचा न पाए, कल का सूरज रूठेगा,
सूखी धरती की छाती पर, हर सपना फिर टूटेगा।
आओ मिलकर हाथ बढ़ाएँ, हरित धरा फिर सजाएँ,
प्रेम, दया और संरक्षण से, जीवन का दीप जलाएँ।
सुनो संताप वसुंधरा का, अब उसकी आवाज़ बनो,
धरती माँ के घायल मन पर, आशा का मधुमास बनो।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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