बाल भार

नन्हीं आँखों में सपनों का एक संसार बसा था,

कंधों पर बस्ता होना था, पर श्रम का भार रखा था।


जिस उम्र में गुड़ियों से बातें, खेल-खिलौने भाते हैं,

उस उम्र में ये मासूम बच्चे जीवन-भार उठाते हैं।


हाथों में कलम नहीं, टोकरी और पत्थर दिखते हैं,

उनके कोमल अरमानों पर कितने पहरे लिखते हैं।


चेहरे पर बचपन की मुस्कान कहीं खो-सी जाती है,

रोटी की मजबूरी हर इच्छा को चुप कर जाती है।


ये भी तो इस धरती पर उजले कल के अधिकारी हैं,

इनकी आँखों के सपनों में भविष्य की फुलवारी है।


जब नन्हे कदम बढ़ेंगे आगे, देश प्रगति कर जाएगा,

हर बच्चे का हँसता बचपन भारत का मान बढ़ाएगा।


डॉ रुपाली गर्ग

मुंबई महाराष्ट्र 

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