नेत्रदान
नाजुक अंग हैं नेत्र हमारे, जीवन का अनुपम वरदान,
इनसे ही पहचान जगत की, इनसे ही होता सम्मान।
जिसकी आँखों में अंधियारा, जिसका हर सपना है मौन,
नेत्रहीन उस मन की पीड़ा, समझ सके न कोई कौन।
सूरज, चाँद, सितारे, पर्वत, सब उससे अनदेखे हैं,
रंग-बिरंगे फूल धरा के, केवल शब्द ही लेखे हैं।
यदि इस नश्वर जीवन का भी, कुछ अर्थ अमर कर जाना है,
नेत्रदान का दीप जलाकर, मानव धर्म निभाना है।
मृत्यु द्वार पर जब आएगी, तन मिट्टी में मिल जाएगा,
पर नयन ज्योति का यह दान, किसी जीवन को चमकाएगा।
माँ का चेहरा, नभ का आँचल, जब वह पहली बार देखे,
खुशियों के मोती बन आँसू, उसकी पलकों पर आ ठहरे।
आओ मिलकर प्रण यह लें, अंधकार से युद्ध करें,
नेत्रदान कर इस धरती पर, उजियारे का बीज भरें।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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