पहलगांव एक साल

साल बीत गया…
पर पहलगाम की वादियों में अब भी गूंजती है
उस दिन की टूटी हुई धड़कन।

जहाँ कभी झरनों की हँसी बहती थी,
आज भी कहीं गहरे एक सिसकी छुपी है—
धीमी, मगर जिद्दी।

वो दिन…
जब धूप भी सहम गई थी,
और पेड़ों ने अपने साये समेट लिए थे,
जैसे प्रकृति ने आँखें मूँद ली हों।

कुछ कदम थे—
जो लौटकर घर नहीं आए,
कुछ नाम थे—जो अब तस्वीरों में बस गए।

माँ की गोद अब भी खाली है,
और पिता की आँखों में
एक अधूरा आसमान।

डॉ रुपाली गर्ग 
मुंबई महाराष्ट्र

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