पुरुष ... पहलू

वो पुरुष—
जिसके कंधों पर दुनिया टिकी है,
और दिल में एक अनकही थकान बसी है ,
सुबह उम्मीदों के जूते पहनकर निकलता,
शाम को ज़िम्मेदारियों से भरा लौटता।

हँसी ओढ़ लेता है चेहरे पर,
और अपने दुख जेब में रख लेता 
उसे सिखाया गया—मज़बूत रहो,
टूटना कमजोरी है, यह मत कहो।

इसलिए आँसू भी इजाज़त माँगते हैं,
आँखों में आकर भी रुक जाते हैं।

बेटा बनकर सपने ढोता है,
पिता बनकर छाँव बन जाता है,
पति बनकर वादे निभाता है,
भाई बनकर ढाल बन जाता है।

खुद के लिए कम,
दूसरों के लिए ज़्यादा जीता है,
वो पुरुष—जो सबका सहारा है,
पर अक्सर खुद को अकेला पाता है।

अगर कभी वो चुप है,
तो समझ लेना—
वो थका है, कमज़ोर नहीं।


डॉ रुपाली गर्ग 
मुंबई महाराष्ट्र

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