नारी
एक सभ्य और सशक्त समाज वही होता है जहाँ नारी सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र महसूस करती है। यदि पुरुष अपनी सोच में संवेदनशीलता, समानता और आदर को स्थान दे, तो नारी का सम्मान स्वतः सुनिश्चित हो जाएगा।
नारी परिवार की धुरी है। वह केवल घर संभालने वाली नहीं, बल्कि भावनात्मक संतुलन और नैतिक मूल्यों की संरक्षक है। वह माँ के रूप में पीढ़ियाँ गढ़ती है, बहन के रूप में स्नेह देती है और पत्नी के रूप में जीवनसाथी बनती है।
फिर भी समाज ने अक्सर उससे त्याग, धैर्य और सहनशीलता की अपेक्षा अधिक की है। लैंगिक भेदभाव, वेतन असमानता, घरेलू हिंसा और रूढ़ मानसिकता जैसी समस्याएँ आज भी मौजूद हैं।नारी शक्ति है, सृजन है, संवेदना है और संघर्ष भी। उसकी यात्रा सम्मान से बंधन और फिर स्वतंत्रता की ओर अग्रसर रही है। आज आवश्यकता है कि नारी को दया नहीं, अवसर मिले; संरक्षण नहीं, विश्वास मिले।
नारी का उत्थान ही समाज का उत्थान है। जिस दिन हर नारी निर्भय, शिक्षित और आत्मनिर्भर होगी, उसी दिन मानवता की प्रगति पूर्णता को प्राप्त करेगी।
डॉ रुपाली गर्ग
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