सफ़र
चलती रेल और थमते एहसास,
हाथ हिलाता कोई, आँखों में प्यास,
भीड़ के बीच भी तन्हा-सा मन,
जाता हुआ अपना, रह जाता क्षण,
खिड़की से झांकती उम्मीद की डोर,
कहती—“फिर मिलेंगे”, दिल में शोर,सफर तो आगे बढ़ जाता है यूँ ही,
पर यादों का प्लेटफॉर्म रह जाता है वहीं,
हर विदाई में छुपा होता है एक वादा,
फिर मिलने का, फिर हंसने का इरादा,
पर उस पल की चुप्पी सब कह जाती है,
दिल की गहराई तक छू जाती है,
चलती रेल तो बस आगे बढ़ जाती है,
पर पीछे छोड़ जाती है—
कुछ अधूरी बातें,
कुछ भीगे जज़्बात,
और यादों की लंबी सौगात…
डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट्र
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