फूल और नारीर
रंग-बिरंगे फूलों की इस बगिया में,
एक तितली चुपके से मुस्काती है,
जैसे हर पंखुड़ी के आँचल में
नारी अपनी कहानी सजाती है।
पीले फूल-सी उजली उसकी आशा,
लाल कली-सा उसका स्वाभिमान,
हरियाली-सी शीतल उसकी ममता,
और आकाश-सा ऊँचा उसका मान।
वो तितली बन उड़ती रहती है,
बंधन कितने भी क्यों न हों,
काँटों के बीच भी खिलना सीखे,
आँसू कितने भी क्यों न हों।
हर फूल को छूकर जैसे,
वो जीवन में रंग भरती है,
टूटी डालों, सूखी राहों में भी
उम्मीदों की फसल उगाती है।
नारी भी उस बगिया जैसी—
चुपचाप सृजन रचती जाती,
खुद धूप में जलकर भी
सबको छाँव की ठंडक दे जाती।
तितली के पंखों में जैसे
सपनों का संसार सजा है,
वैसे ही नारी के आँचल में
पूरा एक ब्रह्मांड बसा है।
डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट्र
Comments
Post a Comment