खामोशी होती है दिल की जुबान

घर में सब कुछ था—लोग, बातें, आवाज़ें।
फिर भी वह अक्सर चुप रहती थी।
क्योंकि हर सवाल का जवाब देने के बाद भी
उसे कभी समझा नहीं गया।
एक दिन उसने बोलना छोड़ दिया।
ना शिकायत, ना सफ़ाई।
लोगों ने सोचा—
“नाराज़ है, मान जाएगी।”
दिन बीते।
उसकी खामोशी लंबी होती गई।
अब वह गुस्सा नहीं थी,
वह थक चुकी थी।
एक शाम माँ ने पूछा,
“कुछ कहती क्यों नहीं?”
वह मुस्कुराई—
और पहली बार सच बोला,
“अब कहने को कुछ बचा ही नहीं।”
उस दिन सब समझ गए—
शब्दों के ख़त्म होने से नहीं,
सुने न जाने से
खामोशी जन्म लेती है।

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