गुलाब
वो सिर्फ़ फूल नहीं था,
वो एक हिम्मत थी—
काँटों के बीच
ख़ुद को कोमल रखने की।
हर पंखुड़ी में
छुपी थी कोई अनकही बात,
जैसे मुस्कुराहट ओढ़े
आँखों में ठहरी नम बात।
लोग उसकी खुशबू पर रीझे,
पर किसी ने ये नहीं पूछा—
कितनी चोटों से गुज़रकर
उसने ये रंग पाया।
गुलाब ने सिखाया मुझे,
कि खूबसूरती
नाज़ुक होने में नहीं,
दर्द सहकर भी
महकते रहने में है।
जब मुरझाया तो भी शिकायत नहीं की,
चुपचाप ज़मीन को सौंप दिया
अपना आख़िरी रंग—
जैसे प्रेम
कभी ख़त्म नहीं होता,
बस रूप बदल लेता है।
डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट्र
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