भाव
रूपाली हूँ मैं भाव की, शब्द मेरे श्रृंगार,
सच की लौ से रोशन करूँ, मन का हर अंधकार।
संवेदना मेरी साँस है, लेखन मेरा धर्म,
पीड़ा में भी ढूँढ लूँ, आशा का कोमल मर्म।
प्रश्नों से मैं जूझती, उत्तर खोजूँ नित,
जीवन को कविता करूँ, हर पल, हर इक क्षित।
नारी मन की थाह में, साहस मेरा साथ,
स्वप्नों को सच कर चलूँ, थामे सच्ची राह।
सीखती हर ठोकर से, बढ़ती हर इक हार,
रूपाली की पहचान है—सच, संवेदना, विचार।
डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट
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