कान्हा की लीला
कभी कान्हा बन माखन खाते,
बच्चों संग हँस-हँस खेलते।
कभी गोविंद बन जग को भाते ,
बांसुरी से मन के बादल खुल जाते।
कभी मुरारी बन छलिया से,
हर मन की मुश्किल दूर कराते।
कभी वसुदेव-सुत अंधियारे में,
धर्म का उजियारा कहलाएँ।
कभी देवकीनंदन , नन्द लाला बन मुस्काए
माखन की गंध घरों में लाएँ।
कभी मधुसूदन रूप धारण कर,
अधर्म का जंगल काट दिखाते।
कभी श्यामसुंदर बन रूप लुटाए ,
राधा के भावों में रंग ले आए।
कभी घनश्याम बन ,
मेघों-सा गहन प्रेम उभरें।
कभी मुरलीधर मधुर तान में,
थके हुए दिलों को सहलाएँ।
कभी गोवर्धनधारी बनकर,
छोटे से पर्वत को थामें खड़े,
कभी पार्थसारथी बनकर,
धर्म का दीप स्वयं जलाएँ।
कभी योगेश्वर बनकर
गीता का ज्ञान जग को समझाएँ।
नाम बदलें, रूप बदलें,पर भाव सभी के एक,
जहाँ प्रेम, करुणा, सत्य बसे—वहीं बसते हैं कृष्ण नेक।।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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