जीवन की गीता से बात
शोर बहुत है मन में,
जैसे भीड़ में खोया कोई बोल,
गीता कहती—
“रुक जरा,
पहले खुद से मिल, फिर दुनिया खोल।”
कर्म की डोरी पतली-सी,
इच्छाओं की पतंग भारी,
पर गीता समझाती—
“उड़ना है तो आसमान देख,
डोर पकड़—पर इच्छा से न हार ही।”
जीवन के हर मोड़ पर
दो आवाज़ें आतीं—
एक भय की, एक विश्वास की,
गीता मुस्कुराकर बोले—
“जहाँ विश्वास खड़ा हो जाए,
वहीँ से शुरू होती है आस की।”
अर्जुन हम सब के भीतर है,
कभी उलझा, कभी टूटा, कभी डरा,
और कृष्ण?
वह हर बार कहता है धीरे से—
“तू लड़, पर पहले खुद को समझ ज़रा।”
न युद्ध हमेशा मैदान में होता,
कभी मन में भी तूफ़ान उठते हैं,
गीता कहती—
“जीत वही असली है,
जब अपने डर भी तुमसे झुकते हैं।”
त्याग, भक्ति, योग—नाम भले हों अनेक,
संदेश मगर एक ही गहरा—
“कर्म करते जाओ,
पर दिल को बाँधना मत किसी फ़ायदे के पहरे।”
और अंत में समझ आता है—
गीता कोई ग्रंथ नहीं,
एक आईना है भीतर का,
जहाँ कृष्ण भी तुम हो,
और अर्जुन भी तुम ही—
बस पहचानना है
उस रोशनी को
जो हर अँधेरे को चीरकर
आत्मा के स्वर को मुक्त करती है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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