भाषा
महाराष्ट्र के कल्याण में अर्नव खैरे (Arnav Khaire) नामक 19 वर्षीय कॉलेज छात्र ने कथित तौर पर एक स्थानीय ट्रेन में हिंदी बोलने पर हुए हमले के बाद मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या कर ली। इस घटना ने बड़े पैमाने पर आक्रोश पैदा किया है और भाषा-आधारित हिंसा पर बहस छेड़ दी है।
क्या भाषा किसी की जिंदगी से बढ़ कर होती है ???????
मानव सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है—भाषा। भाषा केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि भावनाओं, विचारों, संस्कृति और पहचान का वाहक है। समाज में भाषा जितनी विविध होती है, उतनी ही समृद्धि और सौंदर्य जन्म लेता है
भाषा मनुष्य की वह शक्ति है जो विचारों को स्वर देती है और समाज को जोड़ने का माध्यम बनती है। लेकिन जब यही भाषा कटु, कठोर और आहत करने वाले शब्दों का रूप ले लेती है, तो यह संवाद का सेतु नहीं, बल्कि दूरी और तनाव की खाई बन जाती है। कटु शब्द केवल कानों को नहीं, मन और संबंधों को भी चोट पहुँचाते हैं।
भाषा मनुष्य की वह शक्ति है जो विचारों को स्वर देती है और समाज को जोड़ने का माध्यम बनती है। लेकिन जब यही भाषा कटु, कठोर और आहत करने वाले शब्दों का रूप ले लेती है, तो यह संवाद का सेतु नहीं, बल्कि दूरी और तनाव की खाई बन जाती है। कटु शब्द केवल कानों को नहीं, मन और संबंधों को भी चोट पहुँचाते हैं।
हर शब्द में ऊर्जा होती है—सकारात्मक भी और नकारात्मक भी। जब व्यक्ति क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या या हताशा में कटु शब्दों का प्रयोग करता है, तो संवाद का उद्देश्य बदल जाता है।
समाज में अक्सर किसी के उच्चारण, बोली या भाषा बोलने के अंदाज़ का मज़ाक बनाया जाता है। अनेक लोग मज़ाक के नाम पर ऐसे शब्द बोल देते हैं जो सामने वाले को भीतर तक आहत कर देते हैं।
किसी की भाषा को “गंवार”, “देहाती”, या “हास्यास्पद” कहना।
बोलियों को कमतर बताना।
दूसरे क्षेत्र की भाषा को सुनकर हँसना।
गलत उच्चारण पर कटु टिप्पणी करना।
ऐसी बातें सुनने में छोटी लग सकती हैं, पर इनके प्रभाव गहरे होते हैं।
भाषा किसी व्यक्ति की आत्मा होती है। उसका मज़ाक उड़ाना या कटुता दिखाना न केवल असंवेदनशीलता है बल्कि समाज की एकता के लिए भी खतरा है। सम्मानजनक भाषा केवल एक आदत नहीं—एक संस्कार है।
हमारी बोली, हमारी भाषा—हमारी पहचान है।
और किसी की पहचान का सम्मान करना मनुष्य होने की सबसे बड़ी गरिमा।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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