अखबार
हर सुबह वो खामोश-सा आता,
पर भीतर तूफ़ान छिपा लाता,
कभी मुस्कान, कभी आँसू बन जाता,
हर दिल की बात यूँ कह जाता,
किसी के बेटे ने परीक्षा में नाम कमाया,
तो किसी माँ ने अपना लाल खोया,
कहीं उत्सव की तस्वीरें खिलतीं,
कहीं चीखें, जहाँ उम्मीदें सिलतीं,
सुबह की चाय का साथी बनकर,
हर दिन नई कहानी कह जाता —
सियासत के रंग भी छप जाते,
सच्चाई के स्वर भी दब जाते,
कभी सच को उजागर करता है,
कभी सवालों को बेघर करता है,
पर फिर भी, ये कागज़ अमर है,
हर धड़कन का दस्तावेज़ असर है,
कभी समाज का आईना लगता,
कभी अंतरात्मा को झकझोरता,
अख़बार नहीं, समय का सारथी है,
जो हर युग में सच्चाई गुनगुनाता।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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