प्रेम दीवानी मीरा

निशि दिन नयनन नीर बरसते, मन श्याम बिन सूना लागे,
प्रीत तुम्हारी प्राणों में बसती, तेरा ही नाम अनुरागे।

महल-चतुर्भुज छोड़ गई मैं, लोक लाज सब त्याग,
अब तो केवल तुम ही शेष, तुम ही मेरा राग।

मोर मुकुट की छवि मन भावे, बाँसुरी की धुन मन हर ले,
श्याम बिना मीरा की दुनिया, जैसे दीप बिना पर जल ले।

विष प्याला भी मधुर लगे है, जब नाम तेरा आ जाए,
पीर हृदय की मिट जाए मोहन, दर्शन भर दिखलाए।

घन घटा-सा मन व्याकुल है, विरह की अगन जलाए,
श्याम तुम्हारी एक झलक को, मीरा प्राण लुटाए।

भक्ति बनी जीवन की डोरी, आँसू बने आरती,
व्याकुल मीरा श्याम तुम्हारी, दरस पुकारे भारती।

डॉ रुपाली गर्ग 
मुंबई महाराष्ट्र

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