खुशियों की दिवाली
खुशियों की दिवाली
दिवाली भारत का सबसे प्रमुख और पवित्र त्योहार है। यह अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। सभी लोग इस दिन अपने घरों को दीपक और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और मिठाइयाँ बाँटते है।समाज का एक बड़ा हिस्सा — गरीब वर्ग — इस पर्व को बहुत सादगी से मनाता है ।ग़रीबी के कारण इसे भव्य रूप में नहीं मना पाते। उनके लिए दिवाली केवल सपनों और आशाओं का पर्व है।
गरीबों की दिवाली बहुत सादगी और श्रद्धा से मनाई जाती है। उनके घरों में महंगी लाइटें नहीं होतीं, पटाखों की आवाज़ नहीं होती, और मिठाइयाँ बहुत कम ही मिल पाती हैं। इसके बावजूद उनका उत्साह और हर्ष अद्भुत होता है। वे मिट्टी के छोटे-छोटे दीये जलाते हैं और भगवान से अपने जीवन में खुशियाँ, स्वास्थ्य और सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं। उनके दिलों में जो सच्ची खुशी और संतोष होता है, वह किसी भी महंगी सजावट से अधिक उजाला बिखेर देता है। वे मिट्टी के दीपक जलाकर, भगवान से अपनी और अपने परिवार की भलाई की प्रार्थना करते हैं। उनके छोटे-से घर में जब एक दिया जलता है, तो मानो पूरी दुनिया रोशन हो उठती है।
गरीब वर्ग की दिवाली हमें यह सिखाती है कि सच्ची खुशी धन या भौतिक वस्तुओं से नहीं आती, बल्कि दिल की शुद्धता और संतोष से आती है। बच्चे छोटी-छोटी चीज़ों में खुशियाँ ढूँढ लेते हैं। परिवार एक साथ मिलकर दीये जलाता है, थाली सजाता है और साधारण मिठाई का आनंद लेता है। उनके चेहरे पर जो मुस्कान होती है, वह किसी महंगी सजावट से कम नहीं होती।
दिवाली केवल धन से नहीं, मन की रोशनी से जगमगाती है। गरीबों की मुस्कान, उनका आपसी प्रेम और संतोष इस पर्व को और भी पवित्र बना देता है। वे दूसरों की खुशी देखकर खुश होते हैं, और यही भावना दिवाली का असली अर्थ बताती है — “अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना।”
गरीबों की दिवाली हमें यह सिखाती है कि खुशी का संबंध धन से नहीं, बल्कि दिल की भावना और सच्चे उजाले से होता है। अगर हर कोई थोड़ा-सा प्रेम और सहायता बाँटे, तो दुनिया की हर दिवाली सच में “खुशियों की दिवाली” बन सकती है।
डॉ रुपाली गर्ग
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