सीखने का झोल
सीखने का झोल
सीखना बड़ी अद्भुत चीज़ है। यह वही प्रक्रिया है, जिसके नाम पर हम बचपन से लेकर बुढ़ापे तक नोटबुक, किताबें, मोटी-मोटी फ़ाइलें और अब मोबाइल-लैपटॉप ढोते रहते हैं। बचपन में कहा गया था — “पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो हो जाओगे ख़राब।” लेकिन सच तो यह है कि पढ़ाई करके आधे लोग बेरोज़गार हुए और खेल-कूद करके आधे करोड़पति।
गणित में x और y निकालना सीखा, लेकिन सब्ज़ीवाले से मोलभाव करना अब तक नहीं सीखा।
इतिहास में पानीपत की तीसरी लड़ाई रट ली, लेकिन गली की पहली लड़ाई सुलझाना अब भी मुश्किल है।
विज्ञान ने सिखाया कि पानी हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बनता है, पर यह नहीं बताया कि नल में पानी क्यों नहीं आता।
शिक्षक दिन-रात समझाते रहे कि "सीखना जीवनभर चलता रहता है।" पर यह बात हमें तब समझ आई जब दफ़्तर में "Excel सीखो, PowerPoint सीखो, Zoom सीखो, Teams सीखो" का रट्टा लगवाया गया।
घर वाले कहते हैं, "रसोई सीखो," दफ़्तर वाले कहते हैं, "Presentation सीखो," और समाज कहता है, "तमीज़ सीखो।" यानी इंसान चाहे जितना भी सीख ले, किसी को यह संतोष नहीं होता कि अब यह परफ़ेक्ट है।
आजकल लोग कहते हैं — "सीखो, वरना AI तुम्हारी नौकरी खा जाएगा।" पर असली मज़ा तो इसमें है कि AI बनाने वाले भी सीख रहे हैं कि इसे इंसानों जितना सीधा कैसे रखा जाए।
सीखना बड़ा गज़ब का खेल है। यह वह चीज़ है, जो बचपन में डंडे से, जवानी में डिग्री से और बुढ़ापे में अनुभव से मिलती है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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