पितृ पक्ष
पितृ पक्ष
पितृ पक्ष आ गया है। अचानक हमें याद आ गया कि हमारे भी पूर्वज थे। वैसे साल भर तो हम उनकी तस्वीरों पर जमी धूल भी नहीं झाड़ते, लेकिन जैसे ही पितृ पक्ष आता है—हमारे भीतर का श्रद्धालु जाग उठता है।
इन दिनों गली-मोहल्लों में लोग बड़े गर्व से बताते हैं कि “आज हमने पिंडदान किया, तर्पण किया”। पर वही लोग पूरे साल अपने घर के बुज़ुर्गों को यह कहकर चुप करा देते हैं कि “अरे, आपको क्या पता आजकल के ज़माने का!”
कितना अच्छा होता, अगर पितृ पक्ष के साथ कोई “जीवित पितृ पक्ष” भी मनाया जाता, जिसमें जीवित माता-पिता की देखभाल की जाती, उन्हें समय दिया जाता और उनकी बातें सुनी जातीं। पर अफसोस, हम आसान रास्ता चुनते हैं—थोड़े से चावल, तिल और जल से आत्मा तृप्त करने का दावा करते हैं।
कितना अच्छा होता कि वो स्मरण करते कि आज हम जो भी हैं, उसमें हमारे पूर्वजों का योगदान से है।उनकी तपस्या, संघर्ष और संस्कार ही हमारे जीवन की नींव हैं।
इसलिए कृतज्ञता के भाव से उन्हें याद करना हमारा कर्तव्य है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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