पर्दा

पर्दा सिर्फ़ रेशम का टुकड़ा नहीं,

ये कभी आँखों की नमी छुपाता है,

कभी झूठ को सच का चेहरा देता,

कभी दिल की सच्चाई दबाता है।


पर्दा है वह, जो औरत पर लादा गया,

"मर्यादा" कह, कई बार टोका गया,

कभी इज़्ज़त बना, कभी बेबसी,

कभी बन गया पूरी जिंदगी की खामोशी।


चेहरों पर मुस्कान का पर्दा,

मन में छुपे तूफ़ानों को ढँकता है,

हर रोज़ हम हँसते रहते हैं,

जबकि अंदर कुछ टूटता है, तड़पता है।


पर्दा कभी पर्दा नहीं होता,

वह कभी सवालों की दीवार होता है,

कभी जवाबों से बचने की राह,

कभी दिलों के बीच की दरार होता है।


चलो किसी दिन हटा दें यह पर्दा,

बिना डर, बिना लाज, बिना संकोच,

शायद तब हम खुद से मिल पाएँ,

और सच की रौशनी में जी पाएँ।


डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर

मुंबई महाराष्ट्र 

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