इंद्र धनुष
जब मन का आँगन भीग गया,
बूँदों ने भीतर कुछ कह दिया,
तब नभ की चुप्पी में दूर कहीं,
इंद्रधनुष मुस्कुरा गया वहीं,
वो सात रंग नहीं बस रंग थे,
हर एक में कुछ जज़्बात संग थे।
लाल में जलती थी कोई वेदना,
पीला था बीते पल की चेतना,
हरा किसी खोई आशा सा,
नीला था गहराता त्रास सा,
बैंगनी में अधूरी कहानी थी,
आसमानी में कोई निशानी थी।
वो पल क्षणिक था फिर भी गहरा,
जैसे चुपचाप कोई कह गया पहरा,
इंद्रधनुष कभी बस रंग नहीं होता,
वो टूटे दिल का स्वप्न भी होता,
जो कहता है — जीवन थमे नहीं,
अंधेरे में भी कोई रंग सजे कहीं।
डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट्र
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