शिव

काल के भी जो काल हैं, संहार जिनका नाम,

भय भी जिनसे कांप उठे, वे हैं महाकाल महान।

शिव नहीं केवल रूप हैं, शिव तो एक विचार,

सत्य, तप, त्याग और त्राण – उनका ही अवतार।

त्रिनेत्र से जो देख लें, जीवन हो निर्वाण,

भस्म रमा जो तन पे, करते मरण का दान।

डमरु की टंकार से, जागे सोई चेत,

तांडव की हर एक थाप, सृष्टि का रहस्य रचेत।

श्मशानों के भी स्वामी हैं, साधुओं के तारणहार,

सत्य के पथ पर जो चले, उनके हैं महाकाल।

भक्ति से नहीं मापे जाते, ना ही माला-जाप से,

मन के भीतर जो झांके, मिलते वहीं महाकाल से।

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