मेरी ताकत
कभी उलझी तो ,
कभी सुलझी हु ,
कलम मेरी ताकत,
शब्दों से सबके अहसासो को रखतीं हु।
नदी सी शान्त ,
हरपल चुप रहती हूं ,
हर ठोकर में राग सुनाती ,
हर पल आगे बढ़ती रहती हूँ।
अग्नि से भी तेज चमकती ,
अन्याय पर दहकती धड़कती हु,
अपनो के लिए मैं ,
काली भी बन जाती हूं।
मैं बादल का मन बहलाती ,
कभी बरसती ,कभी छा जाती ,
माँ बन कर ममता लुटाती,
आशा में ख्वाबों को मैं दिल में बसाती ।
मैं आईना हु सच कहती ,
हर चेहरे के भाव मैं पढ़ती ,
सकारात्मकता के साथ,
सबको साथ लेकर चलती हु ।
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