कलयुग

कंस का राज है, रावण चारों ओर,

हर दिशा में उठता है पाप का शोर,

धर्म दबा है धन के नीचे,

सत्य रुका है तिलमिलाए पीछे।

राजमहल में बैठा है झूठ,

सच्चाई के पास न वस्त्र, न रूठ,

राम की मर्यादा बिकती है आज,

रावण को मिलती जय की आवाज़।

कंस की बंसी पर नाचते लोग,

कृष्ण की बांसुरी बन गई अब शोक,

देवकी की गोद में बंधन का नाम,

माताओं के आँगन में कैसा अंधकार तमाम।

हर गाँव में लंका, हर शहर में द्वारका,

पर सत्य हो कैद और झूठ हो तारका,

मनुष्य बना दानव, मुख पे मुखौटा,

हर दिल में बैठा कोई नया धोखेबाज़ भ्राता।

किन्तु यह युग भी बीतेगा ज़रूर,

कृष्ण फिर चलेंगे शंख की सूर,

राम का बाण फिर जलेगा छाती,

रावण की लंका फिर होगी खाली।

कंस का अंत भी निश्चित है, मित्र,

हर अधर्म का होगा पराजित चित्र।

बचेगा वही जो सच्चा होगा,

हर रावण अंत में पस्त होगा।

डॉ रुपाली गर्ग

मुंबई महाराष्ट्र 

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