चेतना
नहीं चाहिए संवेदना ,
इस दिल में दबी है बेदना,
वक्त ने हर पल चाहा मुझे थकेलना ,
हालातो ने मजबूर करके,
आंसुओं की गलियों में चाहा बिखेरना ,
न जाने किन-किन पीड़ाओं को पड़ा झेलना,
अभिलाषा के बिना भी घावों को पड़ा कुरेदना।
अब जगी है दिल मे चेतना,
सारे गमों को अब बस समेटना ,
बहुत हुआ खुद को समझना ,
अब बदलती हवाओं में उड़ना ,
सकारात्मक के साथ सबको पहचाना,
हिंसा की दीवार तोड़ नई देखनी है दुनिया ,
संघर्षशीलता का संकल्प ले ,तोड़नी है विडंबना ,
प्रगतिशील रहूं हर पल ,यही है मनोकामना।
डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट्र
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