पल दो पल की जिंदगी

जिंदगी दो पल की

जिंदगी दो पल की कहानी,

कभी हँसी, कभी वीरानी ,

एक पल में खिलते सपने,

दूजे में सब हो जाए धुंधले।

सूरज सा चमके जब भाग्य,

तो छाँव भी लगे सौभाग्य,

पर छिन जाए गर कोई अपना,

तो दिल रोए, आँख न सपना।

चलती रहती पगडंडी सी,

कभी सीधी, कभी भटकती सी,

हर मोड़ पे कुछ नया मिलता,

कभी खुशी, तो कभी छल छलता।

समय नहीं है रोने का ज्यादा,

ना ही शिकायतों का वादा,

जो है आज, वही है जीवन,

कल की किसे है पहचान बन?

इसलिए हँस लो, बाँट लो प्यार,

छोटा सा जीवन है ये उपहार,

जिंदगी दो पल की मेहमान है,

हर पल इसकी पहचान है।

डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर

मुंबई महाराष्ट्र 

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