अनोखा रिश्ता

न कह पाए जो हर बात,
न दिखा पाए कभी जज्बात,
पर हर मोड़ पर साथ रहे,
छाया बनकर पास रहे।

चुपचाप जो सहते रहते,
खुशियों के दीप जलाते रहते,
अपने सपनों को भूलकर,
हमारी राहें सजाते रहते।

माँ की ममता खुलकर बहती,
पिता की ममता गहरी रहती,
डांट में भी उनका प्यार छुपा,
हर चिंता से हमें दूर रखा।

कंधे पर बिठा कर दुनिया दिखाई,
हर मुश्किल में ताकत दिलाई,
पैरों में कांटे कभी न आने दिए,
अपने पसीने से राहें बनाई।

पिता हैं तो आसमान है,
हर सपना उनके नाम है,
जीवन की इस भीड़ में,
पिता सबसे खास हैं, सबसे अनाम हैं।


डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर 
मुंबई महाराष्ट्र

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